अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निरोध दिवस 12 जून/World Day Against Child Labour

बचपन में वापिस कौन नहीं जाना चाहता, आज भी अगर किसी से पुछा जाये कि वो कैसी जिंदगी जीना चाहता है? तो धरती पर हर व्यक्ति अपने बचपन के दिनों को फिर से जीना चाहता है। जिसमे कागज़ की कश्ती, कंचों से निशाने, पतंगबाज़ी, परियों की कहानी, साइकिल race, पेड़ पर चढ़ना, दोस्तों से झगड़ना, दिवाली पर पटाखों के लिए जिद्द करने का रोमांच भी था और माता पिता की डांट में छुपा प्यार भी। कोई चिंता नहीं, हँसता खेलता झूले पर झूलता बचपन किसको याद नहीं आता। लेकिन, दुर्भाग्य इस बात का भी है कि आज भी ये बचपन दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। बहुत से बच्चों का जीवन बाल श्रम के विषैले वातावरण में तबाह हो रहा है। कोई राजू किसी दूकान पर बर्तन मांज रहा है, और कोई छोटू बनकर बीडियों की factory में बण्डल बाँध रहा है। लेकिन बता दें साहब!! अक्सर ये छोटू अपने घर के बड़े होतें हैं, जिनके बचपन को किताबों का नहीं बल्कि जिम्मेवारियों की गठड़ी का बोझा उठाने के लिए तैयार होना पड़ता है।

  

अगर आप आंकड़ो में जायेंगे तो पता चलेगा कि बाल श्रम के मामले में भारत देश की क्या दुर्दशा है। भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चा किडनैप होता है, और उनसे किस तरह के काम करवाए जातें हैं इसके नतीजे तो और भी रूह कंपा देने वाले हैं। किसी से भीख मंगवाई जाती है, तो किसी के अंग बेचे जातें हैं, child trafficking के सच को जानने के लिए आपको फिल्मनिर्माता मनीष हरिशंकर की फिल्म “चारफुटिया छोकरे” जरूर देखनी चाहिए, इसके अलावा हाल ही में आई रानी मुखर्जी की मूवी “मर्दानी” में दिखाया गया कि किस तरह लड़कियों को sex worker बनाकर दुसरे देशों में भेजा और बेचा जाता है।

समाज को आइना दिखाती ऐसी कई मूवीज़ हैं लेकिन वास्तविक रूप से काम करने वालों की भी कमी नहीं है। बच्चों के लिए प्रशंसनीय काम  करने वालो में  नोबेल पुरस्कार विजेता “कैलाश सत्यार्थी” का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। भारत में मध्य प्रदेश के विदिशा में 11 जनवरी 1954 को जन्मे कैलाश सत्यार्थी 1980 से ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ चलाते हैं।

“I dream for a world which is free of child labour, a world in which every child goes to school. A world in which every child gets his rights.”  Kailash Satyarthi

वे पेशे से Electronic engineer हैं, जिसकी शिक्षा उन्होंने सम्राट अशोक प्रदयोगिकी संस्थान विदिशा से ग्रहन की, लेकिन उन्होने 26 वर्ष की उम्र में ही अपना करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। इस समय वे ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ (बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान) के अध्यक्ष भी हैं।

कैलाश 144 देशों के 83000 से ज्यादा बच्चों के बचपन को गुलामी की बेड़ियों में जकड़े जाने से बचा चुकें हैं। 2014 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसके साथ ही पाकिस्तान की नारी शिक्षा के लिए काम करने वाली मलाला युसुफजई को भी नोबेल पुरस्कार दिया गया।

“हर एक मिनट मायने रखता है, हर एक बच्चा मायने रखता है, हर एक बचपन मायने रखता है।” कैलाश सत्यार्थी 

सत्यार्थी को 2015 में हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार “Humanitarian Award” से भी सम्मानित किया गया है। भारत में यह पुरस्कार पाने वाले  कैलाश सबसे पहले नागरिक हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निरोध दिवस के अवसर पर आइये हम प्रण करें कि  हम  किसी  भी बच्चे के बचपन को अँधेरे में  नहीं जाने देंगे और जहाँ तक संभव होगा हम उसे शिक्षित कर अपनी सामाजिक जिम्मेवारी का निर्वहन करेंगे।

“मैं ये मानने से इनकार करता हूँ कि दुनिया इतनी गरीब है, जबकि सेनाओं पर होने वाला सिर्फ एक हफ्ते का वैश्विक खर्च हमारे सभी बच्चों को क्लासरूम में ला सकता है।” कैलाश सत्यार्थी

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