आखिर था कौन दुल्ला भट्टी जिसे हर लोहड़ी पर याद किया जाता है?

Hello Fellows,

पंजाब का “रोबिन हुड” कहें “Son of Punjab” कहें और या फिर “दुल्ला भट्टी” किसी भी नाम से जानें दुनियाँवाले, लेकिन उसका असली नाम था “अब्दुल्ला भट्टी” जो कि राजपूत मुसलमान था और अकबर के राज्यकाल में उसके शत्रुओं में से एक था।

लेकिन शत्रुता का कारण क्या था?

पाकिस्तान पंजाब में एक जगह है “पिंडी भट्टियाँ” वहां प्रसिद्द जमीदारों में अब्दुल्ला के पिता “फ़रीद” और उसके दादा को “बिजली या संदल” के नाम से जाना जाता था। इन दोनों ने मुगलों को जमींदारी कर(टैक्स) देने से मना कर दिया था इसके बदले में दोनों को अकबर द्वारा मरवा दिया और उनके शव में भूसा भरके गाँव के बाहर लटकवा दिया था। बाप दादा के मरने के 4 महीने बाद दुल्ला का जन्म उसकी माँ लद्दी की कोख से हुआ।

पंजाब के लोग आज भी अकबर की बर्बरता के किस्से कुछ यूं कहते हैं: 

तेरा दादा संदल मरया, दित्ता बोरे विच पा

मुगलां पुठियाँ खालां लाके, भरया नाल हवा 

संयोगवश अकबर के पुत्र जहाँगीर का जन्म भी उसी दिन हुआ, अकबर के दरबारियों ने उसे सलाह दी कि भविष्य में उसका बेटा बहादुर बन सकता है अगर उसे किसी राजपूती महिला का दूध पिलाया जाये और उसका लालन-पालन एक राजपूती महिला द्वारा किया जाये।

यह जानते हुए भी कि लद्दी का परिवार सत्ता विरोधी रहा है फिर भी अकबर ने जहाँगीर(शेखू) की ज़िम्मेवारी लद्दी को सौंप दी। अकबर यह बात जनता था कि भट्टी की तीसरी पीढ़ी भी विद्रोह करेगी जिसकी भरपाई राज सिंहासन को करनी पड़ सकती है लेकिन दरबारियों के सलाह के चलते वह लद्दी को शाही संरक्षण देने के लिए विवश था।

जब भट्टी जवान हुआ तो उसे अपने बाप दादाओं के राजपूती स्वभाव का पता चला कि किस तरह वे लोगों की भलाई के काम करते थे अब भट्टी भी “रोबिन हुड” की तरह अकबर के जमींदारों को लूटते और गरीबों में बाँट देते।

अब्दुल्ला भट्टी लड़कियों को मुसलमानों के द्वारा दास/रखैल/गुलाम बनाये जाने के भी घोर विरोधी थे। संदल बार नाम की एक जगह जहाँ लड़कियों बलपूर्वक बेचने के लिए भेजा जाता था और अमीर लोगों द्वारा उनकी बोली लगाई जाती थी।

ऐसे ही एक किसान था सुन्दरदास और उसकी दो बेटियां थी “सुंदरी” और “मुंदरी” (कुछ इतिहासकारों का कहना है कि वे अनाथ थी)  अब हुआ यूं कि गाँव के एक जमींदार की नीयत उन दोनों बहनों पर खराब हो गयी जिसके चलते सुन्दरदास परेशान थे और उन्होंने यह बात दुल्ला को जा सुनाई। इसके बाद अब्दुल्ला ने आव देखा ना ताव जमींदार के खेतों को आग लगा दी और दोनों बहनों शादी वहां करवा दी जहाँ सुन्दरदास जी चाहते थे शादी के शगुन में एक सेर शक्कर दी गयी।

दूसरी कहानी कहती है अनाथ लड़कियों को किसी के द्वारा बेच दिया गया था वहां से उन्हें दुल्ला ने छुड़ा कर इसी रात को आग जलाकर उनकी शादी करवा दी और शगुन में एक सेर शक्कर देकर विदा कर दिया।

भई! जितने मुंह उतनी बातें:) चलो The End की तरफ बढतें हैं…..

अब्दुल्ला भट्टी ने अकबर के ज़मींदारों को इतना लूटा कि अकबर की नाक में दम करके रख दिया। 12000 सैनिक अकेले दुल्ला को पकड़ नहीं पाए। कहतें हैं कि 1599 में दुल्ला को धोखे से पकड़ा गया और दरबार में पेश किया।  इसके बाद उन्हें फांसी दे दी गयी और आज लाहौर में उनकी कब्र है जहाँ वो सदा के लिए सोये हुए हैं।

दुल्ला भट्टी की समाधि

ये गीत आपने भी सुना होगा जो उनकी याद में गाया जाता है क्योंकि दुल्ला जी पंजाब के थे इसलिए पंजाब में मुख्य रूप से इसे मनाने के प्रचलन हुआ।

सुन्दर मुंदरिए,  तेरा कौन विचारा
दुल्ला भट्टीवाला,  दुल्ले दी धी व्याही
सेर शक्कर पायी,  कुड़ी दा लाल पताका
कुड़ी दा सालू पाटा,  सालू कौन समेटे

मामे चूरी कुट्टी, जिमींदारां लुट्टी
जमींदार सुधाए, गिन गिन पोले लाए
इक पोला घट गया, ज़मींदार वोहटी ले के नस गया

इक पोला होर आया, ज़मींदार वोहटी ले के दौड़ आया
सिपाही फेर के ले गया, सिपाही नूं मारी इट्ट
भावें रो ते भावें पिट्ट………

साहनूं दे लोहड़ी , तेरी जीवे जोड़ी
साहनूं दे दाणे तेरे जीण न्याणे

असली कहानी तो सुन लो!

वास्तविक कहानी कहती है कि हिरन्यकश्यप की एक बहन थी होलिका, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान था कि अगर वह वरदान में मिली हुई चुनरी ओढ़ कर आग में भी बैठ जाएगी तो आग उसे जला नहीं पायेगी।

होलिका व् प्रह्लाद

इधर प्रहलाद जी थे जो अपने पिता को ईश्वर मानने को तैयार नहीं थे और हरि नाम की रट लगाये हुए थे, घमंडी पिता द्वारा कई बार प्रहलाद को मारने की कोशिश की गयी लेकिन हर बार भगवान विष्णु उन्हें बचा लेते थे। पिता ने अपनी बहन होलिका की सलाह्नुसार प्रहलाद को जलती चिता पर बिठा दिया लेकिन प्रभु की अपरम्पार महिमा के चलते वह चुनरी होलिका से उड़कर प्रहलाद जी पर आ गयी जिससे होलिका तो जलकर राख हो गयी और प्रहलाद जी बच गये।

तो भैया! ये है असल कहानी! नक्कालों से सावधान;)

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सिर्फ़ पंजाब में ही नहीं मनाया जाता लोहड़ी- जी हाँ! पूर्वांचल उत्तर प्रदेश में इसे “खिचड़वार” के नाम से मनाया जाता है, दक्षिण भारत में पोंगल भी लोहड़ी के आसपास ही मनाया जाता है। (हो सकता है कि दक्षिण भारत के लोग इस दिन अधिक दान पुण्य इसलिए करतें हैं क्यूंकि राजा बलि जिनकी कर्मभूमि दक्षिण भारत में ही रही है और दानवीर राजा बलि अपने दादा प्रह्लाद की याद में यज्ञ करतें हों जिसके बाद दान दक्षिणा का क्रम आगे बढ़ा हो) और यही यज्ञों का एक प्रकार लोहड़ी के रूप में आज हमारे सामने है।

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