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विवेकानंद जी के 3 अनुभव जो बदलेंगे आपकी ज़िन्दगी

Swami Vivekanand

Hello Fellows,

12 जनवरी “राष्ट्रीय युवा दिवस” के रूप में मनाया जाता है। 100 -150 वर्ष बीत जाने के बाद भी युवाओं में स्वामी विवेकानंद का प्रभाव कम होता दिखाई नहीं देता बल्कि ऐसा लगता है कि जैसे अभी अभी किसी सन्यासी ने युवाओं का मार्ग प्रशस्त किया है।

भारत में समय समय पर अनेक हुतात्माओं का जन्म हुआ जिन्होंने समाज को एक सूत्र में बंधने के साथ साथ जीवन के मार्ग को भी प्रशस्त किया उन्ही में से एक थे “स्वामी विवेकानन्द”।

कभी कभी किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाएं उस व्यक्ति विशेष को महान बनाने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जाती है।

आइये जानतें हैं स्वामी विवेकानंद जी 3 अनुभव जो बदलेंगे आपकी ज़िन्दगी:

#1. दूसरों के पीछे मत भागो!

एक बार स्वामी जी अपने आश्रम में एक पालतू कुत्ते के साथ टहल रहे थे तभी एक नवयुवक आश्रम में आते ही उनके चरणों में झुक गया और बोला- “स्वामी जी मैं बड़ा परेशान हूँ प्रतिदिन पुरुषार्थ करने के बाद भी मैं जिंदगी में कुछ कर नहीं पाया, पता नहीं ईश्वर ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है जो इतना पढ़ लिख जाने के बाद भी मुझे आजतक सफलता नहीं मिली”

स्वामी जी युवक की परेशानी को तुरंत भांप गये और बोले- भाई! मेरे इस कुत्ते को थोड़ी दूर सैर करा लाओ उसके बाद मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दे दूंगा।

ऐसा सुनकर युवक को थोड़ा अटपटा सा लगा लेकिन बिना कोई प्रश्न किये कुत्ते को दौड़ाते हुए सैर करने निकल गया।

काफी देर तक सैर करने के बाद जब वह युवक आश्रम में पहुंचा तो स्वामीजी ने देखा कि इतनी देर सैर कराने के बाद भी युवक के चेहरे पर कोई थकान नहीं है जबकि कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से हांफ रहा है।

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स्वामीजी ने पूछा- भाई! क्या हुआ? मेरा कुत्ता तो इतना थक गया है और हांफ रहा है, तुम बड़े शांत से प्रतीत होते हो, तुम्हे थकावट नहीं हुई क्या?

युवक बोला- “स्वामीजी! मैं तो आराम से चल रहा था लेकिन यह बड़ा अशांत था और रास्ते में मिलने वाले हर जानवर के आगे पीछे ये कुत्ता भाग रहा था इसीलिए एक जैसी दूरी तय करने के बाद भी मुझे थकावट नहीं हुई”

स्वामीजी बोले- “भाई! यही तो तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर है कि लक्ष्य तुम्हारे अगल-बगल है और या तुमसे कहीं थोड़ा दूर है लेकिन अपने लक्ष्य को छोड़ तुम अन्य लोगों के पीछे दौड़ने लगते हो जिससे कि अपने वास्तविक लक्ष्य से तुम दूर होते चले जाते हो”

युवक को स्वामी जी की बात समझ आ गयी और अपने प्रयासों द्वारा वह अपनी गलती सुधारने लग गया।

कई बार हमारे भी जीवन में हम अपने इंटरेस्ट को छोड़कर दुसरे लोगों के अनुसार चलने की कोशिश करतें हैं कि अगर मुझे अपनी field में सफलता नहीं मिली तो हो सकता कि जिसमें मेरा कोई दोस्त सफल हुआ है मैं भी वही करूँ भले ही आपकी उस काम में कोई रुचि ना हो, ऐसा करके हम अपनी प्रतिभा को स्वयं खत्म कर देतें हैं और पूरा जीवन संघर्षरत रहतें हैं।

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#2. मातृभाषा का सम्मान

एक बार स्वामीजी विदेश यात्रा पर थे और उनके स्वागत के लिए काफी लोग आए हुए थे  उन लोगों ने स्वामी जी की तरफ हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया और Hello कहा- इस के जवाब में स्वामीजी ने दोनों हाथ जोड़कर “नमस्ते” कहा।

उन लोगों को लगा कि स्वामीजी को अंग्रेजी नहीं आती तो किसी ने स्वामी जी से हिंदी में पुछा कि “आप कैसे हैं??”

स्वामी जी बोले: “आई एम फाइन, थैंक यू”!

अभी लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमने इंग्लिश में पुछा तो आपने हिंदी में उत्तर दिया और जब हिंदी में पुछा तो आपने अंग्रेजी में उत्तर दिया, इसका कारण क्या है ??

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स्वामीजी ने उत्तर दिया- जब आप अपनी माँ का सम्मान कर रहे थे तो मैं अपनी माँ का सम्मान कर रहा था और जब आपने मेरी माँ का सम्मान किया तो आपकी माँ को सम्मान देना मेरा कर्तव्य बनता है। 🙂

किसी भी भाई बहन को इंग्लिश ना आने की वजह से शर्मिंदा होने की आवश्यकता नहीं है, अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व का भाव रखना ही सच्ची देशभक्ति है।

आजकल समाज में ट्रेंड बन चुका है कि लोग यह कहने में गर्व महसूस करतें हैं कि “मेरी हिंदी थोड़ी कमजोर है” और इंग्लिश में बात करना पसंद करतें हैं. अरे! डूब मरना चाहिए जिसे अपनी भाषा का ज्ञान और उस पर अभिमान नहीं है।

रोजमर्रा की जिंदगी में अमेरिका में भी अगर आपको इंग्लिश बोलनी नहीं आती लेकिन आप अपने प्रयास द्वारा किसी भी तरह टूटी फूटी इंग्लिश के शब्द जोड़कर उन्हें कुछ समझाने की कोशिश करतें हैं तो ऐसा नहीं है कि आपको वे लोग हीन भावना से देखेंगे बल्कि आपके प्रति एक सम्मान की भावना का निर्माण होगा कि हमारे देश का ना होने के बावजूद हमारी मातृभाषा में बात करने के कोशिश की जा रही है।

#3. देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा 

बहुत से भ्रमण और भाषणों के बाद स्वामी जी अपने निवास स्थान पर लौटे, उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहाँ ठहरे हुए थे। वे अपना भोजन खुद बनाते थे और एक दिन वे खाना बना रहे थे तो कुछ बच्चे उनके पास आकार खड़े हो गये।

हर सन्यासी का बच्चों के निश्छल मन से विशेष लगाव रहता ही है तो स्वामीजी ने एक एक करके सारी रोटियां उन बच्चो में बाँट दी। पास बैठी महिला बड़े आश्चर्य से सब कुछ देख रही थी, उससे रहा नहीं गया और पुछा कि “सारी रोटियां तो उन बच्चों को दे डाली! अब आप क्या खायेंगे?

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स्वामीजी के होंठों पर मुस्कान दौड़ गयी और बोले- “माँ! रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने की वस्तु है, इस पेट में न सही तो उस पेट में ही सही। देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है” 

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