Newsfellow.com Uncategorized आखिर क्यों करतें हैं श्राद्ध?/Reasons behind doing the “Shraddh”

आखिर क्यों करतें हैं श्राद्ध?/Reasons behind doing the “Shraddh”



इस पोस्ट के माध्यम से हम जान पाएंगे कि आखिर हम श्राद्ध क्यों करतें हैं और इसके पीछे के क्या कारण हैं?

भगवान श्री कृष्ण द्वारा उपदेशित गीता जी के अनुसार आत्मा अजर और अमर है इसे कोई शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती , पानी गीला नहीं कर सकता है और ना ही हवा सुखा सकती है। मनुष्य शरीर त्यागने के पश्चात उसका सम्बन्ध मृत्युलोक से बिलकुल           समाप्त हो जाता है और परलोक में आत्मा का ही अस्तित्व रहता है। एक विशेष शरीर को छोड़ने के बाद उसका उससे कोई वास्ता नहीं रहता और  ना ही उस शरीर में रहते हुए उसने जितने भी लोगों से संबंध बनाया, उनसे कोई सरोकार रहता है। ऐसा सुनकर अर्जुन आश्चर्यचकित हुए और कहने लगे कि हे! मधुसूदन मुझे आपकी बातें सत्य प्रतीत नहीं होती, तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात स्वर्गलोक की यात्रा पर भेजा और अभिमन्यु ने अपने ही पिता को पहचानने से इंकार कर दिया तब जाकर अर्जुन को भगवान की बातों का सार समझ में आया।

इसी पौराणिक कथा के अनुसार यह मान्यता है कि मनुष्य की आत्मा मृत्यु के पश्चात् अगला शरीर मिलने तक भटकती रहती है, उसका यह विचरण समाप्त हो और उसे मोक्ष की प्राप्ति हो इसलिए श्राद्ध या पितृ पूजा की जाती है।

मनुष्य के कर्मों के आधार पर आत्मा को देवयोनि या मनुष्य योनि की प्राप्ति होती है। अच्छे कर्म करने वाले लोगों को मोक्ष अर्थात देवयोनि और अपनी इच्छाओं में फसे व्यक्ति का जन्म मनुष्य योनि में होता है

श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध पक्ष इस वर्ष 15 दिन के होंगे।  वर्ष 2016 में भी श्राद्ध 15 के दिन के थे। लगातार दूसरे वर्ष तिथि घटने से पितृ पक्ष का एक दिन कम हो गया है। अब 16 दिन के श्राद्ध का संयोग वर्ष 2020 में बनेगा। 

श्राद्ध करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए :

  • श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही उपयोग करना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बछड़ा या बछड़ी हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। ऐसी गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
  • श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन को दोनों हाथों से पकड़ना चाहिए, मान्यता है कि एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
  • पंडित जी को भोजन मौन रहकर एवं भोजन की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रहकर भोजन करें।
  • शस्त्र आदि से मारे गए पितरों का श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं।
  • श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य पापी के समान होता है।
  • जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
  • बने हुए भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा-थोड़ा भाग अवश्य निकालें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
  • पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
  • श्राद्ध करते समय लोहे के आसन का प्रयोग किसी भी रूप में नहीं होना चाहिए। रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन सर्वोत्तम हैं।

भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ

श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार हैं:

तर्पण– इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान– पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता

क्या स्त्रियां भी कर सकती है पिंडदान?

किसी भी मृतक के ‘अन्तिम संस्कार’ और श्राद्धकर्म की व्यवस्था के लिए प्राचीन वैदिक ग्रन्थ ‘गरुड़पुराण’ में कौन-कौन से सदस्य पुत्र के नहीं होने पर श्राद्ध कर सकते है, उसका उल्लेख अध्याय ग्यारह के श्लोक सख्या- 11, 12, 13 और 14 में विस्तार से किया गया है।

जैसे – पुत्राभावे वधू कुर्यात् भार्याभावे च सोदनः। शिष्यो वा ब्राह्मणः सपिण्डो वा समाचरेत्॥ 
ज्येष्ठस्य वा कनिष्ठस्य भ्रातृःपुत्रश्चः पौत्रके। श्राध्यामात्रदिकं कार्य पुत्रहीनेतखगः॥ –गरुड़पुराण 11/11-12

अर्थात “ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू, पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एकमात्र पुत्री भी शामिल है। अगर पत्नी भी जीवित न हो तो सगा भाई अथवा भतीजा, भानजा, नाती, पोता आदि कोई भी यह कर सकता है। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई भी रिश्तेदार अथवा कुल पुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है।

इस प्रकार परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध व तर्पण और तिलांजली देकर मोक्ष कामना कर सकती है।

जब सीता जी ने किया राजा दशरथ का पिंडदान: 

‘वाल्मीकि रामायण’ में सीता जी द्वारा पिण्डदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुँचे। वहाँ श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए और उधर दोपहर हो गई थी। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढती जा रही थी।
अपराह्न में तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की माँग कर दी। गया के आगे फल्गु नदी पर अकेली सीताजी असमंजस में पड गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वट वृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया।
जिस से राजा दशरथ संतुष्ट हुऐ और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।

आईये जानते है कि हिन्दू पंचांग के अनुसार कौनसी तिथि का श्राद्ध कब करना है |
पुर्णिमा का श्राद्ध =   ता० 6 सितम्बर 2017 बुधवार
प्रतिपदा का श्राद्ध = ता० 7 सितम्बर 2017 गुरुवार
द्वितिया का श्राद्ध = ता० 8 सितम्बर 2017 शुक्रवार
तृतीया का श्राद्ध = ता० 9 सितम्बर 2017 शनिवार
चतुर्थी का श्राद्ध =  ता० 10 सितम्बर 2017 रविवार
पंचमी का श्राद्ध = ता० 10 सितम्बर 2017 रविवार
षष्ठी का श्राद्ध = ता० 11 सितम्बर 2017 सोमवार
सप्तमी का श्राद्ध = ता० 12 सितम्बर 2017 मंगलवार
अष्टमी का श्राद्ध = ता० 13 सितम्बर 2017 बुधवार
अपने मातृ पक्ष की तिथि नही पता वे मातृ नवमी में करें
नवमी का श्राद्ध = ता० 14 सितम्बर 2017 गुरुवार
अपने पिता पक्ष की तिथि नही पता होने पर दशमी में करें
दशमी का श्राद्ध = ता० 15 सितम्बर 2017 शुक्रवार
एकादशी का श्राद्ध = ता० 16 सितम्बर 2017 शनिवार
द्वादशी का श्राद्ध = ता० 17 सितम्बर 2017 रविवार
त्रयोदशी का श्राद्ध = ता० 18 सितम्बर 2017 सोमवार
परिवार के अकाल मृत्यु प्राप्त लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी में करें
चतुर्दशी का श्राद्ध = ता० 19 सितम्बर 2017 मंगलवार
तो इस प्रकार कुछ बातों का ध्यान रखकर हम अपने पितृ ऋण से मुक्त हो सकतें हैं। दोस्तों! आपको हमारी यह पोस्ट कैसी लगी? हमें कमेंट के माध्यम से या ईमेल द्वारा hellonewsfellow@gmail.com पर अवश्य बताएं।

2 thoughts on “आखिर क्यों करतें हैं श्राद्ध?/Reasons behind doing the “Shraddh””

  1. Sonu says:

    Its good to read such article focusing traditions and religion.

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