जब 10 साल के ओशो के सामने महात्मा गाँधी की हुई बोलती बंद!!!/Osho’s answer to Gandhi

मैं 96 रोल्स रोयस रखने वाले OSHO की बात नहीं कर रहा, ना ही college में पढ़ाने वाले रजनीश की बात कर रहा हूँ। मैं उन चन्द्र मोहन जैन की बात कर रहा हूँ, जिनका जन्म 11 दिसम्बर 1931 को भोपाल के रायसेन जिला के कुछ्वाडा गाँव में हुआ था। बात उन दिनों की है जब वे केवल 10 वर्ष के थे। कालान्तर में जब वे सन्यासी बने तो अपने प्रवचन में उन्होंने एक घटना बताई कि महात्मा गाँधी ने एक बार train से भोपाल से गुजरना था, और मेरा उनसे मिलने का मन हुआ। मैं जब गया तो train 13 घंटे लेट थी। भारत में Trains का कोई पता नही, इसलिए मेरी दादी, जोकि ये जानती थी कि दोपहर के भोजन के समय तक पता नहीं चंद्रमोहन आ पाए या नही। इसलिए उन्होंने 3 Rs दिए जोकि उन दिनों किसी खजाने से कम नहीं थे। Train लेट होने की वजह से काफी लोग जा चुके थे, और स्टेशन मास्टर के साथ सारा दिन बातें करते हुए एक प्रेम भाव निर्मित हो गया। Train station पर आ पहुंची। निवेदन करने पर… कि ये बच्चा गाँधी जी से मिलने की जिद्द कर रहा है, इसने सुबह से कुछ नहीं खाया… ऐसा कहने पर गाँधी जी से मुझे मिलने दिया गया।

वो तृतीय श्रेणी में सफ़र कर रहे थे, जिसमे उनकी पत्नी व उनका सचिव था। 60 यात्रियों के उस डिब्बे को 3 लोगों के लिए आरक्षित किया गया था। और train की तृतीय कक्षा ऐसी कि प्रथम श्रेणी भी शरमा जाये। लेकिन बाहर जो बोर्ड लगा था उस पर तृतीय श्रेणी ही लिखा था। मानो ऐसा लिखकर महात्मा गाँधी के दर्शन को छुपाया जा रहा था।

महात्मा गाँधी ने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे देखा, मुझपर देखने की बजाए उनकी नजर मेरी पॉकेट पर थी और उन्होंने पूछा “वह क्या है?”

मैंने कहा “तीन रूपये”

उन्होंने कहा “दान कर दो”। उनके पास एक छेद वाला box था, जिसमे पैसे डालते ही गायब हो जाते थे। अब उसकी एक चाबी भी जरूर होगी, परन्तु जिसने पैसे डाले उसके लिए तो गायब ही समझो।

मैंने कहा, “यदि आपके पास साहस है तो आप मेरे पैसे ले सकते हैं। जेब वहाँ है, रुपए वहां हैं, लेकिन क्या मैं आपसे ये पूछ सकता हूँ कि आप इन रुपयों को क्यों इकट्ठा कर रहे हैं?”

उन्होंने कहा, “गरीब लोगों के लिए।”

मैंने कहा, “तो यह ठीक है।” और मैंने उन तीनों रुपयों को बॉक्स में गिरा दिया। उनके लिए हैरान करने वाली बात यह थी कि मैंने train से उतरते समय पूरे बॉक्स को अपने साथ ले लिया था।

उन्होंने कहा, “यह तुम क्या कर रहे हो? यह गरीबों के लिए है!”

मैंने कहा, “मैं ये अभी आपसे सुन चुका हूँ, आपको इसे दोबारा-दोबारा दोहराने करने की जरूरत नहीं है। मैं गरीबों के लिए यह बॉक्स ले रहा हूं। मेरे गांव में बहुत सारे गरीब हैं, कृपया मुझे चाबी दें, अन्यथा मुझे किसी चोर से मिलना होगा वह ताला खोल सकता है जो कि इस कला का एकमात्र विशेषज्ञ है। “

उन्होंने कहा, “यह अजीब है ….”

उन्होंने अपने सचिव को देखा सचिव मूक था, उन्होंने कस्तूरबा को देखा, जिन्होंने कहा, “आज आप अपने बराबर के व्यक्ति से मिले हैं, आप सभी को धोखा देते हैं, अब वह अपना पूरा बॉक्स ले रहा है, यह अच्छा है, क्योंकि मैं हमेशा उस बॉक्स को देखते रहने से पक चुकी हूँ” 

मैंने उस व्यक्ति के लिए खेद महसूस किया और बॉक्स को छोड़ दिया और कहा, “आप सबसे गरीब आदमी हैं, ऐसा लगता है कि आपके सचिव को कोई बुद्धि नहीं है और न ही आपकी पत्नी को आपके लिए कोई प्यार है। मैं यह बॉक्स नहीं ले जा सकता। लेकिन याद रखना, मैं महात्मा को देखने आया था, लेकिन मैंने आज केवल एक व्यापारी देखा।” यही उनकी जाति थी। उस युग में महात्मा गांधी केवल एक व्यापारी थे। मैंने उनके खिलाफ हजारों बार बात की है क्योंकि मैं उनके जीवन के दर्शन में कुछ भी नहीं मानता हूं।

ऐसा कहकर चंद्रमोहन अपने रास्ते पर लौट चला और कौन जानता है कि महात्मा ने इस से कोई सीख ली या नहीं:)

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