महाशिवरात्रि की पूरी कथा और जानिए क्या क्या मान्यताएं जुड़ी हैं इस त्यौहार से?

Happy shivratri

Hello Fellows,

आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं:)

शिवरात्रि तो हर महीने आती है लेकिन कारण क्या है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि को ही महाशिवरात्रि के रूप में ही क्यों मनाया जाता है।  आईये जानतें हैं कि शिवरात्रि के पीछे क्या क्या मान्यताएं जुड़ी हैं।

  1. समुद्र मंथन : ऐसा माना जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से निकलने वाले “कालकूट” नामक विष को सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान शिव ने अपने गले में धारण किया था जिसकी वजह से उनका कंठ नीला हो गया था परिणामस्वरूप उन्हें नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है किसी अन्य देवता की ऐसा करने की हिम्मत न हुई  और इसीलिए भगवान शिव को देवों के देव “महादेव” नाम मिला
  2. शिव पार्वती विवाह: कई स्थानों पर ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था जिसके उपलक्ष्य में शिवरात्रि मनायी जाती है
  3. सृष्टि का निर्माण: कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन सृष्टि का आरंभ अग्निलिंग (भगवान शिव का विशालकाय स्वरुप) के उदय से हुआ है लेकिन कुछ मान्यताओं के अनुसार सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी द्वारा वर्ष प्रतिपदा के दिन की गयी
  4. भगवान शिव का जन्म: कहा जाता है कि सृष्टि निर्माण की श्रृंखला में ब्रह्मा जी से रूद्र रूप में भगवान शिव का अवतरण हुआ था और शिवलिंग स्वरुप की पूजा अर्चना के बाद सृष्टि का निर्माण आरंभ हुआ

शिवरात्रि की कथा: 

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से पूछा, ‘ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’ उत्तर में शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- ‘एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं का शिकार करके वह अपने परिवार को पालता था।

उस पर कर्जे का बोझ था और समय पर साहूकार का ऋण चुकाने में असमर्थ  था।  साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया।  और संयोगवश उस दिन शिवरात्रि होने के कारण वह धर्म सम्बन्धी बातें सुनने लगा।

अगले दिन संध्या के समय साहूकार ने क़र्ज़ चुकाने के सम्बन्ध में बात करने के लिए उसे बुलाया और शिकारी अगले दिन क़र्ज़ चुकाने का वचन देकर वहां से छूट गया।  भूख प्यास से व्याकुल उसने शिकार करने की मंशा से जंगल में एक बेलपत्र के वृक्ष पर अपना डेरा जमाया और शिकार का इंतजार करने लगा। पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था जो कि सूखे बेल पत्रों से ढका हुआ था जाने अनजाने में वह बेलपत्र तोड़ता और शिवलिंग पर फेंकता।

इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भवती हिरनी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरनी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मुझे मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरनी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर शिकारी चिंतित हो गया

इसी तरह एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी!’ मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी।

इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े।

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मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।

उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था।

धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह हिरन परिवार सहित शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई।

उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना से प्रभावित हुए और पुष्प-वर्षा करने लगे। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए’।

इस प्रकार जो भी इस कथा को सच्चे मन से सुनता और व्रत का पालन करता है उसके जीवन के सभी कष्ट भगवान शिव की कृपा से नष्ट होतें हैं।

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