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Importance of Teej Festival/जानिये क्यों मनाया जाता है “तीज” का त्यौहार।

तीज का त्यौहार मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है लेकीन इसके पीछे की कहानी को बहुत कम लोग जानतें हैं। श्रावन मास की तृतीया तिथि को श्रावणी तीज के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि वर्षा ऋतु के कारण हर तरफ हरियाली छा जाती है तो इसे हरियाली तीज के नाम से भी जाना जाता है। सावन के महीने में आने वाला यह पर्व भगवान शिव और पार्वती जी को समर्पित है।

क्या कहानी है श्रावणी तीज की : भगवान शिव और पार्वती जी का ऐसा पुनर्मिलन जो 100 वर्षों के बाद सम्भव हो सका।  भगवान शिव माँ पार्वती को उनके पुनर्जन्म का स्मरण करवाने के लिए कथा सुनाते हुए बतातें हैं कि “तुमने पिछले जन्म में घोर कष्ट में रहकर बिना कुछ खाए पीये हिमालय पर्वत की गोद में गंगा जी के किनारे तपस्या की। इस अवधि में तुमने खाने के नाम पर केवल सूखे पत्ते ही चबाये और माघ की शीतलता को सहन करने के साथ साथ ग्रीष्म ऋतु की अग्नि में भी खुद को तपाया। तुम्हारे ऐसा करने से आपके पिता नाराज रहते थे और ये देखते हुए भगवान विष्णु ने नारद जी को आपके पिता के पास भेजा। 

आपके पिता द्वारा कारण पूछने पर नारदमुनि बोले “हे गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहाँ आया हूँ और वे आपकी कन्या से विवाह करना चाहतें हैं तो गिरिराज बोले की स्वयं भगवान विष्णु मेरी पुत्री से विवाह करना चाहतें हैं तो इसमें मुझे क्या ऐतराज हो सकता है? ऐसा सुनकर तुम्हे बहुत दुःख हुआ और तुमने ये बात अपनी एक सहेली को बताई कि “मैंने अपने मन से भगवान शिव का वरण कर लिया है और मैं किसी और से विवाह नहीं कर सकती मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ। अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा।’ तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी, उसने कहा – ‘प्राण छोड़ने का यहाँ कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिये। भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करे. सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं। मैं तुम्हे घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना स्थल भी है और जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हे खोज भी नहीं पायेंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे’

इस तरह तुमने अपने पिता से बचने के लिए एक गुफा में साधना करना बेहतर समझा और भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और उसकी पूजा की। परिणामस्वरुप कैलाश पर्वत हिलने लगा और मैंने प्रकट होकर तुम्हे “तथास्तु” कहा और मैंने कहा कि जो भी स्त्री इस दिन व्रत का पालन करेगी उसे मनवांछित फल की प्राप्ति होगी और इसके तत्पश्चात मैं अंतर्ध्यान हो गया। इसके बाद प्रातकाल होते ही तुमने पूजा सामग्री को जल में प्रवाहित किया और अपने पिता के पास जाकर पूरा वृत्तांत सुनाया और इस बात पर घर चलने को राजी हुई कि “मेरा विवाह यदि भगवान शिव से संपन्न होगा तो ही मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ”। आपके पिता ने सहर्ष ही आपका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

इस व्रत को ‘हरतालिका’ इसलिये कहा जाता है क्योंकि पार्वती कि सखी उन्हें पिता और प्रदेश से हर कर जंगल में ले गयी थी. ‘हर’ अर्थात हरण करना और ‘तालिका’ अर्थात सखी।

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