कब आयेगी फैसले की घड़ी ?

 

 

सबसे पहले शत शत नमन करना चाहूँगा माँ भारती के दो सपूतों को जिन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। मन तो इनकी शहादत से ही अत्यंत दुखी था परन्तु कलेजा उस वक़्त छलनी हुआ जिस समय दोनों शहीदों के शरीर को क्षत-विक्षत का देने की बात सामने आई। साहब! बुरा तब लगता है जब 20-22 लाख की सेना होने के बावजूद हमारे ही जवान इसी तरह शहीद किये जायें, कितने ही उदाहरण चाहे वो दंतेवाडा, सुकमा, पुलवामा, या पठानकोट ही क्यों न हो सब जगह हमारे ही सैनिकों की बलिदानी हो रही है। एक सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद आप तो यूँ चुप हुए कि जैसे दुश्मन को नेस्तनाबूत कर दिया हो, मोदी जी! आज देश सर्जिकल स्ट्राइक नहीं पाकिस्तान की सर्जरी चाहता है।

आज जब मैं याद करता हूँ 1999 में कारगिल का युद्ध चल रहा था तो दादा जी की कुछ पंक्तियाँ जिसे काफी सारे मंचो पर बोलने का मौका मिला:

पाकिस्तान मिटाना है देश अखंड बनाना है, हिंदुस्तान का कौमी झंडा, कराची पर लहराना है

आगे बढ़ते जाना है, ऐसे हाथ दिखाना है, नवाज शरीफ का कान पकड़कर धरा की धूल चटाना है

लेकिन मन दुखी इस बात से है कि 11 साल उम्र में भी पाकिस्तान का कोई हल नहीं था और आज जब 29 वर्ष की आयु है तब भी समस्या जस की तस बनी हुई है। मैं जानना चाहता हूँ कि राजनितिक इच्छाशक्ति इतनी प्रबल क्यों नहीं है कि हम अपनी सेना को उसके decisions खुद लेने दें और अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर देशभक्त सैनिकों को कैसे Defend करना है इसकी ज्यादा चिंता करें। पिनाकी, ब्रह्मोस, अग्नि जैसी मिसाइलें हमने केवल दिखावे या परीक्षण करने के लिए नहीं बनाई, बल्कि उसका सदुपयोग किस समय करना है देश के नेतृत्व को इसकी भी समझ होना आवश्यक है। सर्जिकल स्ट्राइक करने के तुरंत बाद बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया गया जिसमे कि बलूचिस्तान को आजाद करने कि बात कही गयी, टीवी पर प्रतिदिन देखने को मिलता था कि किस प्रकार से बलूचिस्तान के लोगों के साथ पाकिस्तानी सेना द्वारा बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जा रहा है इसलिए बलूचिस्तान को पाकिस्तान के जबड़े से निकाल कर अलग-थलग मुल्क बना देना चाहिए, हम पाकिस्तान को सींचने वाली सिन्धु नदी का पानी रोक देंगे, आखिर क्यों और भी तमाम तरह के मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गये। उन माताओं के बारे में भी सोचिये जिन्होंने देशभक्त जवान तो पैदा किया लेकिन आप उसकी जिम्मेवारी नहीं ले पाए।

साहब! मेजर सौरभ कालिया के बाद हेमराज या मंदीप और न जाने कितने ही नाम गिनवाए जा सकतें हैं जिनकी शहादत के बाद उनके भी शरीर के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया, अगर उसी time माकूल जवाब दिया जाता तो पाकिस्तान कभी हिम्मत न करता ऐसी कायर हरकत करने की। जरा उन पत्नियों के बारे में सोचिये जिन्होंने अपना वैवाहिक जीवन 10 दिन भी नहीं जिया, उन बहनों से पूछिए जिन्होंने राखी तो भेजी लेकिन जवाब में भाई के अंतिम दर्शन ही करने को मिले आखिर कब तक ऐसा ही चलता रहेगा, मुझे एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं कि:

“अम्मा ने खत लिखा चाव से पुत्र न माँ का दूध लजाना, एक इंच पीछे मत हटना, चाहे इंच-इंच कट जाना

छुटकी ने राखी रख दी है, ख़त में बड़े गरूर से, और बहु ने वन्दे मातरम, लिखा है सिन्दूर से

मेरे पोते ने चूमा है, खत को बड़े दुलार से, इसीलिए खत महक रहा है कस्तूरी महकार से

मेरी बूढी छाती में, दूध उबल आया है बेटे, और गोंद की जगह उसी से इसको चिपकाया है बेटे

तेरे बापू लिख्वातें हैं, गोली नहीं पीठ पर खाना, एक इंच पीछे मत हटना, चाहे इंच इंच कट जाना”

तो जनाब एक बात तो साफ़ है कि देशभक्ति कोई कमी नहीं है हिंदुस्तान में, लेकिन हमारी देशभक्ति उस समय चरम पर होती है जिस समय, क्रिकेट मैच में पाकिस्तान को हराना होता है, फिल्मों में पाकिस्तानी कलाकारों पर प्रतिबन्ध लगाने की बात आती है। याकूब मेनन की फांसी पर घडियाली आंसू बहाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी कहां मर गये, जब सुकमा में हमला हुआ और 26 सैनिकों को कुर्बान होना पड़ा, देश को बाहरी दुश्मनों से नहीं आंतरिक दुश्मनों से ज्यादा खतरा है

BAT(Border Action Team) जिसने हमारे सैनिकों का सर काटकर हमे शर्मसार कर दिया, आखिर क्यों हम बदला लेने में समर्थ होने के बावजूद असमर्थ हैं। आज टीवी पर एक रिटायर्ड जनरल को सुना उन्होंने बताया कि एक बार पाकिस्तानी जेहादी हिन्दुस्तानी सैनिक का सर कलम कर ले गया और बन्दूक की नोंक पर उसने जब सर लहराया गया तो गाज़ी की उपाधि दे दी गयी और यही बात जब नवाज शरीफ के सामने आई तो उसने अपनी जेब से 8000 रूपये निकाल कर इनाम दिया। ऐसी सोच के देश के साथ हम किसी भी प्रकार के सम्बन्ध क्यों बनाना चाहतें हैं

हम पूछ्तें हैं कि आखिर आर-पार लड़ाई कब लड़ी जाएगी जब आम Public मारी जाएगी? क्या ये आर पार की लड़ाई नहीं कि संसद में आतंकवादी घुस आतें हैं, मुंबई में समुद्र के रास्ते आकर नरसंहार करते हैं, पठानकोट में Army Base पर हमला करते हैं, और हम गुणगान करतें हैं कि हमने 5 Km अंदर जाकर Surjical Strike को अंजाम दिया। अरे भैया! वो लोग सैंकड़ो-हजारों किलोमीटर अन्दर आकर आपको अपने होने का सबूत दे गये और आप हैं कि एक भी जेहादी का सर कलम कर बॉर्डर पर नहीं टांग पाए वो लोग तो पार आकर लड़ाई छेड़ रहें हैं लेकिन हम न जाने किस संधि के होने के mood में बैठें हैं। मेरी आपसे एक विनती हैं कि फैसला आर्मी को लेने दीजिये, धोती बांधने वाले कैसे आदेश जारी करेंगे कि युद्ध की सही रण-नीति क्या होनी चाहिए, AC कमरों में बैठने वाले ये decide नहीं करेंगे की कब orders देने हैं, जिन्होंने कभी पसीना तक नहीं बहाया वो लोग ये तय नहीं करेंगे कि दुश्मन का ख़ून कब, और कैसे बहाना है। कैसी विडंबना है कि भर्ती के समय जिस फौजी को 1cm. भी height कम हो तो reject कर दिया जाता है, आज उसी फौजी को जिसकी height सर कटने के बाद 1 ft. कम हो गयी, उसके घरवालो को body accept करने के लिए कहा जा रहा है। मन व्यथित है साहब! कृपया कीजिये और देश में एक कानून बनाइए कि जिसके घर से कोई सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा हेतु तैनात होगा केवल वही परिवार का व्यक्ति चुनाव लड़ने और देश का नेतृत्व करने में सक्षम है। जनाब! मैं आग्रह करना चाहता हूँ सभी MP’s को कि भेजिए अपने पुत्रो को देश की सेना में ताकि जब किसी की शहादत हो तो आप यूँ हाथ पर हाथ धरें न बैठें रहें, तब जाकर किसी सैनिक की कुर्बानी 2-4 दिन तक अखबार की सुर्खियाँ नहीं बनेगी बल्कि उसका पूर्ण रूप से निराकरण होगा ऐसा विश्वास है।

अंकुश “हंस”

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