Home > News > जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा की पूरी कहानी जानतें हैं आप?/All about Jagannath Rath-Yatra

जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा की पूरी कहानी जानतें हैं आप?/All about Jagannath Rath-Yatra

भारतभर में मनाये जाने वाले त्योहारों में जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा का विशेष महत्व है  यह यात्रा विश्वभर में निकाली जाती है परन्तु इसके पीछे कथाएँ और मान्यतायें क्या है इसकी जानकारी इस लेख के माध्यम से जुटाने का प्रयास किया गया है यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। यह गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के लिये खास महत्व रखता है। इस पंथ के संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की ओर आकर्षित हुए थे और कई वर्षों तक पुरी में कृष्ण विरह के भजनों को गाते हुए उनकी भक्ति में लीन रहे।  

परम्परागत रूप से मनाई जाने वाली यह यात्रा केवल भारतवासियों के लिए ही नहीं बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।  श्री कृष्ण के अवतार जगन्नाथ जी की रथयात्रा में शामिल होने के पुण्य को 100 यज्ञों के बराबर माना गया है। हिन्दू धर्म में चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी धाम है और मान्यता है कि हर हिन्दू को स्वर्गवासी होने से पहले चार धाम की यात्रा जरुर करनी चाहिए ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 10 दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन से ही शुरू हो जाती है। 

जगन्नाथ जी की रथ यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनायी जाती है अमूमन ये मास जून- जुलाई का होता है इस साल यह यात्रा 25 जून 2017 को निकाली जाएगी जिसका आयोजन 10 दिन तक होगा और शुक्ल पक्ष की एकादशी/ग्यारस 3 जुलाई 2017 को इसका समापन होगा। इस दौरान पुरी में देश विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं और इस महा-आयोजन का हिस्सा बनते हैं। रथ यात्रा के दिन भगवान कृष्ण, उनके भाई बलराम व बहन सुभद्रा को रथों में बिठाकर गुंडीचा मंदिर ले जाया जाता है। विशाल रथों को बनाने की तैयारी महीनों पहले ही शुरू हो जाती है। माना जाता है कि गुंडीचा मंदिर की देवी श्रीकृष्ण की मासी हैं जो उन्हें वहां आने का निमंत्रण देती है और कृष्ण, बलराम, सुभद्रा वहां 10 दिन तक जाकर रहतें हैं। ये बिलकुल वैसा है जैसे बच्चे गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने अपने मामा या मौसी के पास जाकर रहतें हैं:)

इसके साथ साथ अनेकोंअनेक मान्यतायें हैं जो रथ यात्रा से जुड़ीं है कुछ कथाएँ आपसे अवश्य शेयर करना चाहूँगा:

1.ऐसा माना जाता है कि बलराम और श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा अपने मायके आती हैं और अपने भाईयों से नगर भ्रमण की इच्छा व्यक्त करती है और तब तीनों रथ पर सवार होकर नगर का भ्रमण करतें हैं और इसके बाद से ही रथ महोत्सव मनाया जाने लगा। 

2. कुछ किवदंतियों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया था और उसके बाद बलराम और सुभद्रा को साथ ले मथुरा में नगर भ्रमण कर प्रजा को दर्शन दिए थे। तब से ये रथयात्रा का प्रचलन शुरू हुआ। 

3. एक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण की रानियाँ माता रोहिणी से भगवान कृष्ण की रासलीलाएं सुनने की इच्छा व्यक्त करती हैं और माता रोहिणी को लगता है कि बहन सुभद्रा को अपने भाई की रासलीलाएं नहीं सुननी चाहिए इसलिए वे उन्हें भाईयों के साथ नगर भ्रमण पर भेज देती हैं। श्रीकृष्ण, बलराम, सुभद्रा को साथ देख देवी देवता प्रसन्न होतें हैं और नारदमुनि प्रकट हो उनसे हर साल दर्शन देने का निवेदन करतें हैं तीनों द्वारा निवेदन स्वीकार कर लिया जाता है और तब से रथ महोत्सव मनाया जाने लगा। 

4. इसके अलावा सुनने में ये भी आता है कि मामा कंस द्वारा उन्हें मथुरा बुलाने का न्योता भेजा जाता है जिसमे एक सारथी रथ लेकर गोकुल में तीनों भाई बहनों को लेने के लिए जाता है रथ पर सवार तीनों बहन भाइयों को देख मथुरावासी अति प्रसन्न होतें हैं और तब से रथ यात्रा का आयोजन किया जाने लगा।  

जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में उमड़े जन सैलाब को पूरे विश्व में सबसे बड़ा जन सैलाब माना जाता है इतनी विशाल यात्रा अपने आप में ही रोमांच का विषय है लेकिन मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य भी हैं जो विज्ञान की समझ से भी परे हैं। 4 लाख वर्गफुट में फैले इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 214 फुट है। 

1.ध्वजा का हवा के विपरीत लहरानायह भी अपने आप में विस्मयकारी है कि हवा जिस दिशा में बह रही होती है मंदिर की ध्वजा उसके विपरीत लहराती है। प्रतिदिन मंदिर का कोई व्यक्ति ध्वजा को 45 मंजिल ऊपर उलटे चढ़कर बदलता है। एक भी दिन ऐसा न करने से ऐसा माना जाता है कि मंदिर 18 वर्षों तक बंद हो जायेगा। 

2. गुम्बद की परछाई न बनना: किसी भी वैज्ञानिक के लिए यह यकीन करना मुश्किल है कि इतने विशाल आकार के मंदिर के गुम्बद की परछाई धरती पर कहीं भी देखने को नहीं मिलती। हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित भवन निर्माण का ये उत्कृष्ट उदाहरण है। 

3. सुदर्शन चक्र का हर दिशा से समान दिखना: मंदिर के गुम्बद पर बना सुदर्शन चक्र बेहद पवित्र माना जाता है ये अष्टधातु से बना है।  हैरान कर देने वाली बात ये है कि किसी भी दिशा से देखने पर यह सामने ही दिखाई देता है। इसे नीलचक्र भी कहा जाता है।  

4. हवा की दिशा: प्राकृतिक रूप से हवा समुद्र से तटीय इलाको की तरफ बहती है लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है और वायु तटीय क्षेत्र से समुद्र की तरफ बहती है। 

5. गुम्बद पर पक्षी न उड़ना: आमतौर पर देखा जाता है मंदिर मस्जिद, गुरुद्वारों के गुम्बदों पर पक्षी अक्सर अपना  डेरा जमा लेते हैं लेकिन जगन्नाथ पुरी के गुम्बद पर आजतक किसी पक्षी को उड़ते हुए नहीं देखा गया है। 

6. रसोईघर का रहस्य: 500 रसोइये अपने 300 सहयोगियों के साथ मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए खाना बनाते हैं। पूरे वर्षभर का राशन यहाँ उपलब्ध होता है और हर रोज 20 लाख लोग भोजन कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि भोजन भले ही कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों ना बना हो लेकिन लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मिटटी के 7 बर्तनों को क्रमशः एक दुसरे के ऊपर रखा जाता है और आश्चर्य की बात यह है कि लकड़ी की आंच पर पकने वाले इन पात्रों में सबसे ऊपर रखे पात्र का भोजन सबसे पहले पक कर तैयार हो जाता है। 

महाप्रसाद

7. समुद्र की आवाज मंदिर के सिंहद्वार में प्रवेश करते ही समुद्र की आवाज बिलकुल सुनाई नहीं देती लेकिन जैसे ही आप द्वार से बाहर कदम रखतें हैं विशाल सुमद्र की आवाज आप सुन सकते हैं। हालांकि मंदिर के बाहर एक स्वर्ग द्वार भी है जहाँ मृत्युपरांत लाशों को जलाया जाता है लेकिन मंदिर के अंदर मुर्दों के जलने की कोई गंध महसूस नहीं होती जबकि बाहर आते ही इसे महसूस किया जा सकता है।  

इतिहास: अलग अलग इतिहासकारों और पंडितों के मुख से अनेकोंअनेक कहानिया सुनी जा सकती है उनमे से एक कहानी निम्नलिखित है  

ब्रह्मा कृष्ण के नश्वर शरीर में विराजमान थे और जब कृष्ण ने शरीर छोड़ा तब पांडवों ने उनके शरीर का दाह-संस्कार कर दिया लेकिन कृष्ण का पिंड(दिल) जलता ही रहा। ईश्वर के आदेशानुसार पिंड को पांडवों ने जल में प्रवाहित कर दिया। उस पिंड ने लट्ठे का रूप ले लिया।

राजा इन्द्रद्युम्न, जो कि भगवान जगन्नाथ के भक्त थे और गुंडीचा देवी के पति थे उन्होंने इसे जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित कर दिया। उस दिन से लेकर आज तक वह लट्ठा भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर है। वास्तव में इसे ही श्रीकृष्ण के अस्थियों के रूप में पूजा जाता है हर 12 वर्ष के अंतराल के बाद जगन्नाथ की मूर्ति बदलती है लेकिन यह लट्ठा उसी में रहता है।

इस लकड़ी के लट्ठे से एक हैरान करने वाली बात यह भी है कि यह मूर्ति हर 12 साल में एक बार बदलती तो है लेकिन लट्ठे को आज तक किसी ने नहीं देखा। मंदिर के पुजारी जो इस मूर्ति को बदलते हैं, उनका कहना है कि उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथ पर कपड़ा ढक दिया जाता है। इसलिए वे ना तो उस लट्ठे को देख पाए हैं और न ही छूकर महसूस कर पाए हैं। पुजारियों के अनुसार वह लट्ठा इतना मुलायम होता है मानो कोई खरगोश उनके हाथ में फुदक रहा है।

इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु नामक वृक्ष के नीचे मिली थी यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद राजा को विष्णु और विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं।

पुजारियों का ऐसा मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस मूर्ति के भीतर छिपे ब्रह्मा को देख लेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसी वजह से जिस दिन जगन्नाथ की मूर्ति बदली जानी होती है, उड़ीसा सरकार द्वारा पूरे शहर की बिजली बाधित कर दी जाती है। 

जहाँ रखा गया भगवान बुद्ध का दांत:

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर के स्थान पर पहले एक बौद्ध स्तूप होता था। उस स्तूप में गौतम बुद्ध का एक दांत रखा गया था। बाद में इसे इसकी वर्तमान जगह, कैंडी, श्रीलंका भेज दिया गया। दसवीं शताब्दी के लगभग इस काल में बौद्ध धर्म को वैष्णव सम्प्रदाय ने आत्मसात कर लिया था और तभी जगन्नाथ जी की पूजा-अर्चना ने लोकप्रियता पाई। इस समय उड़ीसा में सोमवंशी राज्य चल रहा था।

भगवान जगन्नाथ का महाराजा रणजीत सिंह से नाता:

महाराजा रणजीत सिंह जोकि एक महान सिख सम्राट थे उन्होंने  इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिये गये स्वर्ण से कहीं ज्यादा था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में यह वसीयत भी की थी, कि विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा, जो विश्व में अब तक सबसे मूल्यवान और सबसे बड़ा हीरा है, इस मंदिर को दान कर दिया जाये। लेकिन यह सम्भव ना हो सका, क्योकि उस समय तक, ब्रिटिश ने पंजाब पर अपना अधिकार करके, उनकी सभी शाही सम्पत्ति जब्त कर ली थी। वरना, कोहिनूर हीरा, भगवान जगन्नाथ के मुकुट की शान होता।

 दोस्तों, आपको हमारा यह लेख कैसा लगा, हमें अपने विचार comment box के माध्यम से अवश्य भेजें। और अगर आपको भी भगवान जगन्नाथ जी के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध है तो please हमसे शेयर करें।

6 thoughts on “जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा की पूरी कहानी जानतें हैं आप?/All about Jagannath Rath-Yatra

  1. shri jagganath baldev subhadhra maharani ki jai…

    vry nice bro …bht hi acha likha h apne…keep it up ..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *