एक सैनिक को माँ का ख़त: चाहे इंच इंच कट जाना

यह एक कविता जो बचपन से ही मेरे दिल के बहुत करीब रही है और देशभक्ति से ओतप्रोत है। मैं चरण वंदन करना चाहूँगा श्री बलवीर सिंह “करुण” जी के जिन्होंने इसे लिखा और देश समाज तक एक सैनिक के विचारों को पहुँचाने का काम किया ।

विद्यालय में, college और office में जहाँ भी मुझे इसे बोलने का मौका मिला वहां श्रोताओं में देशभक्ति व उत्साह का संचार हुआ । आप भी इस कविता को विभिन्न अवसरों पर बोलकर पुण्य के भागी बन सकतें हैं।

 

अम्मा ने खत लिखा चाव से , पुत्र न माँ का दूध लजाना

एक इंच पीछे मत हटना, चाहे इंच इंच कट जाना

 

घर परिवार सुखी है मुन्ने, गाँव गली में मंगल है , द्रास कारगिल की घटना से, कदम-कदम पर हलचल है

ज्वालामुखी दिलों में धधके, आँखों में अंगारे हैं ,और अर्थियों के पीछे भी, जय भारत के नारे हैं

यह केवल ख़त नहीं लाड़ले, घर भर का सन्देश समझ, एक एक अक्षर के पीछे तेरा पूरा देश समझ

धवल बर्फ की चादर पर तू, लहू से जय-हिन्द लिख आना, एक इंच पीछे मत हटना, चाहे इंच इंच कट जाना

 

छुटकी ने राखी रख दी है, खत में बड़े गरूर से, और बहु ने वन्दे मातरम, लिखा है सिन्दूर से

मेरे पोते ने चूमा है, खत को बड़े दुलार से, इसीलिए खत महक रहा है, कस्तूरी मेह्कार से

मेरी बूढी छाती में भी, दूध उबल आया है बेटे, और गोंद की जगह उसी से इसको चिपकाया है बेटे

तेरे बापू लिखवाते हैं, गोली नहीं पीठ पर खाना, एक इंच पीछे मत हटना, चाहे इंच इंच कट जाना

 

और दुलारे एक बात को, तू शायद सच न माने, इतिहासों को स्तब्ध कर दिया इस अनहोनी घटना ने

वीर शहीदों की विधवाएं, पुण्य कर रही धरती को, खुद कन्धों पर ले जाती हैं, अपने पतियों कि अर्थी को

और इधर संसार चकित है, लाख नमन उन वृद्ध पिताओं को, आग लगाने से जो पहले, करते नमन चिताओं को

मेरा भी माथा ऊँचा हो, कोई ऐसा करतब करके आना, एक इंच पीछे मत हटना, चाहे इंच इंच कट जाना-2

 

 

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